पृष्ठभूमि
1. स्वातंत्र्योत्तर युग में देश के भीतर कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण किया गया था। तथापि 1970 के दशक के आरम्ミ में सृजित की गई और प्रयुक्त सिंचाई क्षमता के विश्र्लेषण से यह पता चला कि उनके बीच काफी अन्तर था। सिंचाई आयोग ने 1972 की अपनी रिपोर्ट में इस आशय की विशिष्ट सिफारिशें कीं कि सृजित सिंचाई क्षमता का पूरा प्रयोग करने के लिए सिंचाई परियोजनाओं के कमानों के व्यवस्थित विकास का काम हाथ में लेना चाहिए। बाद में सिंचाई और विद्युत मंत्रालय द्वारा स्थापित एक मंत्रि-समिति ने इस मुद्दे का विश्र्लेषण किया और १९७३ में यह सुझाव दिया कि प्रत्येक वृहद सिंचाई परियोजना के लिए एक विस्तृत आधार वाला क्षेत्र विकास प्राधिकरण स्थापित किया जाना चाहिए ताकि व्यापक क्षेत्र विकास का काम किया जा सके। इस सिफारिश के आधार पर प्रभावी जल प्रबन्ध के एकीकृत और समन्वित दृष्टिकोण के जरिए सिंचाई क्षमता प्रयोग में सुधार लाने और सिंचित भूमि से कृषि उत्पादन को इष्टतम बनाने के लिए भारत सरकार ने दिसम्बर 1974 में केन्द्र प्रायोजित क्षेत्र विकास कार्यक्रम (सीएडीसी) की शुरूआत की।
2. कार्यक्रम के लक्ष्यों के अनुरूप अनेक घटक जैसेकि क्षेत्रीय वाहिकाएं और क्षेत्रीय नालियों का निर्माण, वाराबन्दी लागू करना, भूमि समतलन और उसे आकार देना, क्षेत्र सीमाओं का पुनःसंरेखन/जोत-क्षेत्रों का समेकन, उपयुक्त फसल पद्धतियां लागू करना, विस्तार सेवाओं का सुदृढ़ीकरण आदि कार्यक्रम में शामिल कर दिए गए। बाद में तात्कालिक जरूरतों के कारण 1 अप्रैल 1996 से कुछेक और घटक जैसेकि किसानों की सहभागिता और जलग्रस्त क्षेत्रों का सुधार कार्यक्रम में शामिल कर लिए गए जिससे कि कार्यक्रम को किसानों के लिए और अधिक लाミदायक बनाया जा सके।
3. आठवीं और नौवीं पंचवर्षीय योजना अवधियों के दौरान कार्यक्रम कार्यान्वयन की समीक्षा से यह पता चला कि अलग-अलग जोत-क्षेत्रों के लिए सूक्ष्म स्तरीय वितरण नेटवर्क लगミग 13 मिलियन हैक्टेयर्स के लिए तैयार कर लिया गया था और लगभग 11 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई जल की बारी-बारी से आपूर्ति उपलब्ध करा दी गई थी। समीक्षा के दौरान अनेक समस्याएं देखने में आईं जैसेकि निकास के ऊपर की तरफ सिंचाई प्रणाली में कमियों के कारण निकास पर जल आपूर्ति की अविश्र्वसनीयता, अधिशेष पानी के मुख्य नालियों में जाने के लिए सम्पर्क और मध्यवर्ती नालियों का अभाव, गैर-पर्वतीय क्षेत्रों से लघु सिंचाई परियोजनाएं शामिल न करना, राज्य सरकार द्वारा विस्तार और प्रशिक्षण क्रियाकलापों को कम प्राथमिकता, आठवीं योजना के बाद से विभिन्न क्रियाकलापों की लागत में संशोधन न किया जाना आदि। इस समस्याओं के चलते दसवीं योजना की शेष अवधि (2004-07) के लिए इस कार्यक्रम की पुनर्रचना की गई है तथा इसे और अधिक व्यापक तथा किसानों के लिए लाभग्राही बनाने के प्रयोजन से इसे ‘कमान क्षेत्र विकास और जल प्रबन्ध कार्यक्रम (सीएडीडब्ल्यूएम कार्यक्रम)’ का नया नाम दिया गया है।
4. 1974-75 में 60 वृहद और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से शुरू करके 310 परियोजनाएं (कुल मिलाकर लगाग 28.5 मिलियन हैक्टेयर सीसीए) केन्द्र प्रायोजित कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम में शामिल की गई हैं। इनमें से 162 परियोजनाओं के पूरा हो जाने के बाद (कुछ परियोजनाएं समय-पूर्व समाप्त कर दी गई) केन्द्रीय सहायता बन्द कर दी गई है। इन परियोजनाओं की सूची संलग्नक-I में दी गई है। 23 अन्य परियोजनाएं 8 परियोजनाओं के साथ जोड़ दी गई हैं। इस प्रकार दसवीं योजना की शेष अवधि के दौरान पुनर्रचित सीएडीडब्ल्यूएम कार्यक्रम 133 परियोजनाओं में कार्यान्वित किया जा रहा है; परियोजनाओं की संख्या और घटाकर लगभग 100 तक लाई जाएगी। इन 133 परियोजनाओं की सूची संलग्नक II पर संलग्न है। |