राष्ट्रीय जल नीति ने पेयजल आपूर्ति की जरूरत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है जिसके बाद सिंचाई, जल-विद्युत, नौसंचालन और औद्योगिक तथा अन्य प्रयोगों का स्थान आता है। क्रमिक पंचवर्षीय योजनाओं तथा उनके बीच आने वाली वार्षिक योजनाओं में जल आपूर्ति और सफाई प्रणालियां तेजी से विकसित करने की दिशा में प्रयास किए गए हैं। ‘अन्तर्राष्ट्रीय पेयजल आपूर्ति और सफाई दशक’ के सन्दर्भ में इस दशक के अन्त अर्थात मार्च, 1991 तक शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 100 प्रतिशत जनता को जल आपूर्ति सुविधाएं उपलब्ध कराने, शहरी क्षेत्रों में 80 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्रतिशत जनता तक सफाई सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार ने अप्रैल, 1981 में दशकीय कार्यक्रमों की शुरूआत की। तथापि वित्तीय तथा अन्य कठिनाइयों के चलते दशक के लिए मूलतः जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे उन्हें घटाकर शहरी जल आपूर्ति के मामले में 90 प्रतिशत तथा ग्रामीण जल आपूर्ति के मामले में 85 प्रतिशत और शहरी स्वच्छता के मामले में 50 प्रतिशत तथा ग्रामीण स्वच्छता के मामले में 5 प्रतिशत कर दिया गया। अपनाई गई नीति के अनुसार पेयजल के लिए प्रावधान सभीजल संसाधन परियोजनाओं में किया जाएगा। भारत में अधिकांश महानगरों/शहरों की पेयजल मांगों की पूर्ति निकटस्थ क्षेत्रों में स्थित सिंचाई/बहुद्देश्यीय स्कीमों के जलाशयों और यहां तक कि लम्बी दूरी के अन्तरण द्वारा की जाती है। टिहरी बांध से दिल्ली को तथा तेलुगु गंगा परियोजनाओं के जरिए चेन्नई को कृष्णा जल से पेयजल की आपूर्ति अनूठे उदाहरण हैं। |